जीवन में अगर संतों, की शिक्षाओं को अपना लिया जाए तो जीवन खुशहाल बन जाता है। केवल सुनने और सुनाने से ही काम नहीं होता, बल्कि जीवन को व्यावहारिक रूप देने से ही जीवन महान बनता है।
सन्तो की दी हुई शिक्षा पर अमल करने से लोक व परलोक दोनों सुधरते हैं।
दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार, तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।
अर्थ : इस संसार में मनुष्य का जन्म मुश्किल से मिलता है. यह मानव शरीर उसी तरह बार-बार नहीं मिलता जैसे वृक्ष से पत्ता झड़ जाए तो दोबारा डाल पर नहीं लगता.
सन्तो की संगत करने से ही मनुष्य जीवन के मूल उद्देश्य की जानकारी होती हैं । वह परमात्मा को प्राप्त करने के लिए लालायित होकर सुभ कर्म करने लग जाता हैं और जिससे उसका यह जीवन भी सुखदायक हो जाता हैं औऱ परलोक का रास्ता भी सुगम हो जाता हैं।
समाज सुधार में सन्तों की शिक्षा का योगदान
नकली धर्मगुरुओं ने जनता में गलत ज्ञान का प्रचार किया जिस कारण परमात्मा से मिलने वाले लाभ से मनुष्य वंचित हो गया जिससे मनुष्य परमात्मा से विमुख होता जा रहा हैं। जिस कारण सामाजिक बुराइया भी लगातार बढ़ती गई ।
लेकिन इसी बीच सन्त रामपाल जी महाराज शास्त्रों से प्रमाणित ज्ञान जन-जन पहुँचा रहे हैं एवं जो भी मनुष्य इस सच्चे ज्ञान को ग्रहण कर रहा है उसे परमात्मा द्वारा वो सभी लाभ प्राप्त हो रहें है जो शास्त्रो में परमात्मा की महिमा में बताए गए गए हैं जिससे मनुष्य परमात्मा से डरकर शुभ कर्म करते हैं और सभी सामाजिक बुराईयों को तुरंत त्याग देते हैं
सन्त रामपाल जी के अनुयायी किसी भी प्रकार की बुराइयों से पूर्णतः दूर रहते हैं। सिनेमा देखना, नशा करना, चोरी-चकारी, रिश्वतखोरी, दहेज प्रथा, भ्रूण हत्या और भी समाज मे व्याप्त सभी बुराइयों को सन्त रामपाल जी के अनुयायी पूर्णतया त्याग कर एक नए स्वच्छ समाज का निर्माण कर रहें हैं।
इस संसार में अनेक प्रकार के प्राणी हैं जिनमें से एक मनुष्य है। "मनुष्य" उसे कहते हैं जिसमें मनन करने का गुण व शक्ति होती हैं। सभी जीवों में केवल मनुष्य ही है जो अपने विवेक शक्ति का प्रयोग कर सही व गलत का निर्णय स्वयं कर सकता हैं। मानव का उत्थान समय के साथ धीरे धीरे होते अा रहा हैं। आदिकाल से लेकर अब तक मनुष्य में बहुत ही बदलाव देखने को मिला है, चाहे वह शारीरिक बनावट हो, विवेक शक्ति, या आपस में समूहों (समाज) में एक साथ रहना। धीरे धीरे मनुष्य समाज में एक साथ रह कर अपने विवेक शक्ति से अच्छे और बुरे की पहचान कर सकें है। मानव की वर्तमान स्थिति आज का मानव शिक्षित होते हुए भी स्वयं सही गलत की पहचान नहीं कर पा रहा हैं। वर्तमान स्थिति के मावन में भगवान का डर नहीं रहा। वह दूसरों की गलती पर तो बोलता है कि भगवान सब देख रहा हैं, लेकिन खुद दूसरो का बूरा करते हुए इस बात को नहीं याद रखता हैै। वर्तमान में मानव चोरी, डकैती, रिश्वतखोरी, बलात्कार, जीव हिंसा जैसे कुकर्मों को बटोरता जा रहा हैं। और अपने ही कर्म बिगाड़ता जा रहा हैं। कहते है की मानव की असली कमाई उसके अच्छे कर्म, पुण्य ...
"वाल्मीक तुलसी से कह गये, ऐसा कलियुग आयेगा, ब्राह्मण होके वेद ना जानै, मिथ्या जन्म गवायेगा ! बेटा होके मात-पिता ना चीन्हें, त्रिया से नेह लगायेगा, और त्रिया होके पति ना चीन्हें, आन पुरुष मन भायेगा !!" "जब-जब बढ़े असुर और अभिमानी तब-तब धरू मनुष का देहा और हरू सकल देश की पीरा। 'पहले बोधू कोली चमारा पीछे जाए राजदरबारा फिर बोधू पंडित काजी फिर जाए सकल संसारा'। कलियुग मध्य सतयुग ल्याऊँ, तातै सत्य कबीर कहाऊँ। परमेश्वर ने कबीर सागर में वर्णन कर रखा है कि यह तत्वज्ञान पूरे विश्व में किस प्रकार फैलेगा.. परमेश्वर ने बताया है कि.. (पहले बोधू कोली चमारा).. परमात्मा सबसे पहले अपना ज्ञान देकर कोली चमारा अर्थात् मध्यम वर्ग के लोगों को अपनी शरण में लेंगे जैसे आज मालिक की शरण में हम सब मध्यम वर्ग(middle class) के निर्धन लोग है। कोई भी higher class का भगत नहीं है सब मध्यम वर्ग के भगत है जी। (पीछे जाए राजदरबारा).. फिर परमात्मा राजदरबारा का नम्बर लेंगे अर...
•शिक्षा का अर्थ" ज्ञान प्राप्त करना जो कि जीवन में उपयोगी हैं। शिक्षा हमारे जीवन का अभिन्न अंग है हमारी पहली शिक्षा घर से ही शुरू होती हैं। हमारे व्यवहार में जो दिखाई देता है वह हमारे शिक्षा का ही रूप है। शिक्षा के अच्छे और बुरे स्तर के लिए सबसे पहले ज़िम्मेदार अपने घर के अभिभावक होते हैं। क्योंकि बच्चे सबसे पहले अपने अभिभावकों से ही सीखते हैं। जैसे कहते हैं ना, जैसे खावे अन्न वैसे बने मन। इसी प्रकार बच्चो को घर जो प्राथमिक शिक्षा व सामाजिक शिक्षा जाती हैं उसे ही वे अपने जीवन में उतारते हैं। सामाजिक शिक्षा के बाद आती है स्कूली शिक्षा जहा किताबी ज्ञान हमे प्राप्त होता है। लेकिन आज कि बढ़ती हुई टेक्नोलोजी से हमें अच्छी शिक्षा तो प्राप्त हो रही हैं लेकिन हम ज्ञानी अर्थात विद्वान नहीं हो रहे हैं। जैसे कि आधुनिकता में सब डिजिटल होने से अपनी तर्क शक्ति को खोते जा रहे हैं। ...कुछ चीज का उत्तर चाहिए तो सीधे गूगल में खोज लेते हैं। अपने तर्क शिक्षा का उपयोग नहीं कर पाते हैं। शिक्षा की आधुनिकता ने लोगो को काफ़ी लाभ दिए हैं वहीं इसके बहुत सी हानि को भी लोगों को ही भुगतना पड़ा है। •...
Comments
Post a Comment
ऐसे ही रोचक तथ्यों की जानकारी के लिए हमसे जुड़े रहे !