सन्तो की शिक्षा



सन्त का जीवन मे आना परम् मंगलकारी होता हैं।
जीवन में अगर संतों, की शिक्षाओं को अपना लिया जाए तो जीवन खुशहाल बन जाता है। केवल सुनने और सुनाने से ही काम नहीं होता, बल्कि जीवन को व्यावहारिक रूप देने से ही जीवन महान बनता है।
सन्तो की दी हुई शिक्षा पर अमल करने से लोक व परलोक दोनों सुधरते हैं।
         
          



कबीर साहेब जी कहते है कि





दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार, तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।


अर्थ : इस संसार में मनुष्य का जन्म मुश्किल से मिलता है. यह मानव शरीर उसी तरह बार-बार नहीं मिलता जैसे वृक्ष से पत्ता झड़ जाए तो दोबारा डाल पर नहीं लगता.
सन्तो की संगत करने से ही मनुष्य जीवन के मूल उद्देश्य की जानकारी होती हैं ।  वह परमात्मा को प्राप्त करने के लिए लालायित होकर सुभ कर्म करने लग जाता हैं और जिससे उसका यह जीवन भी सुखदायक हो जाता हैं औऱ परलोक का रास्ता भी सुगम हो जाता हैं।

समाज सुधार में सन्तों की शिक्षा का योगदान
 नकली धर्मगुरुओं ने जनता में गलत ज्ञान का प्रचार किया जिस कारण परमात्मा से मिलने वाले लाभ से मनुष्य वंचित हो गया जिससे मनुष्य परमात्मा से विमुख होता जा रहा हैं। जिस कारण सामाजिक बुराइया भी लगातार बढ़ती गई ।

देखें:- कली सन्तो का पर्दाफास 
          लेकिन इसी बीच सन्त रामपाल जी महाराज शास्त्रों से प्रमाणित ज्ञान जन-जन पहुँचा रहे हैं एवं जो भी मनुष्य इस सच्चे ज्ञान को ग्रहण कर रहा है उसे परमात्मा द्वारा वो सभी लाभ प्राप्त हो रहें है जो शास्त्रो में परमात्मा की महिमा में बताए गए गए हैं जिससे मनुष्य परमात्मा से डरकर शुभ कर्म करते हैं और सभी सामाजिक बुराईयों को तुरंत त्याग देते हैं 
सन्त रामपाल जी के अनुयायी किसी भी प्रकार की बुराइयों से पूर्णतः दूर रहते हैं। सिनेमा देखना, नशा करना, चोरी-चकारी, रिश्वतखोरी, दहेज प्रथा, भ्रूण हत्या और भी समाज मे व्याप्त सभी बुराइयों को सन्त रामपाल जी के अनुयायी पूर्णतया त्याग कर एक नए स्वच्छ समाज का निर्माण कर रहें हैं।




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